भारत के आम नागरिक का पत्र : श्री नरेन्द्र मोदी के लिए

 

श्रीमान,

मैं नही जानता २०१४ के चुनाव इस देश की किस्मत में क्या लायेंगे। किन्तु स्वयं अपनी आशा अभिलाषा में यह तय है की देश के प्रशाशन की बागडोर आपके हाथ में हो। अतः यह पत्र मैं आपकोभारत के भावी प्रधान मंत्री को, लिख रहा हूँ । 

इस देश और आम जनता की स्थिति सर्वविदित है। लोग हताश हैं, निराश हैं, दुखी और मानहीन हैं। एक अजीब विपरीत व्यवहार सर्वत्र व्याप्त है : देशहित, लोक कल्याण, पारस्परिक सौहाद्र और जनता की कठिनाई का निवारण किसी की निगाह मैं नहीं है। कर्तव्य परायणता तो बीते समय की बात है। वह परिवार जो भूमि से जुड़े हैं, उनकी अवस्था शोचनीय है; पुरुष के लिए काम व आमदनी का साधन नहीं, स्त्रियों को परिवार को बांधे रखने का रास्ता नही। शराब सस्ती है, भोजन दुर्लभ। शहर में काम की कुछ संभावना है, लेकिन जीवन नरक है जैसे लोग न हों, निम्न प्राणी हों रहने की व्यवस्था नहीं, खर्च इतना की किराया के बाद कुछ बचता नहीं, बच्चों की पढाई प्रायः असम्भव है, पीने को स्वच्छ जल नहीं, डाक्टर और इलाज का व्यय तो दूर की बात है। 

ये हालात देश के साठ फीसदी लोगों का है। तीस फीसदी थोड़े बेहतर और थोडे ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिनशायद ही कोई जरूरतमंद की मदद करने की अवस्था में हो; कुछ जो हैं, उनकी जमीर ही मुड चुकी है। इस त्रस्त जीवन समुद्र में बाकी के दस फीसदी लोगों की एक अलग दुनिया है द्वीप प्राय, कटे हुए, सत्ता और सत्ता की राजनीती से जुड़े लोग जो अपने ही धन और सत्ता के विस्तार में व्यस्त हैं। 

इधर सामाजिक न्यायिक राजनैतिक व्यवस्था ऐसी की बंटी बांटी, हीन विचारों से आघातित, संवेदनहीनता से प्रताड़ित अपनीअपनी मूछें, अपना अपना दुख। सनातन पथ से कोसों दूर ! स्वार्थ, अधर्म, कन्याओं का अपमान, प्रकृति की अवमानना, वनों की कटाई, दूषित जल निधियां शाशनस्थ लोगों के नाक के नीचे। ऐसी व्यवस्था में निराशा, निर्लज्जता, चोरी, लूट और अकर्मण्यता न हो तो कैसे ? निम्न धर्म, दूषित संस्कार और ओछे विचार उसी के अनुरूप व्यवस्था को जन्म देंगे । इन्फ्लेशन मात्र एक संख्या बन रह जाएगी, करप्शन केवल समय का गर्भित संकेत।

मेरी समझ में कोई ऐसा हल नहीं है जो सर्वविदित न हो। हाँ, Financial Market और संस्थाओं को ईमान की पूँजी और बेइमान  के धन में फर्क करने के संस्कारतो होने ही चहिये। हमारे देश का हित अमेरिका की नीति व कानून से नहीं होगा। न ही हमारे राष्ट्र के इतिहास का सही आंकलन पश्चिम के विद्वान कर पायेंगे।

एक परिष्कृत व शक्तिशाली केंद्र हमारे देश की आवश्यकता है और शासन का विकेंद्रीकरण हम नागरिकों की जरूरत। किन्तु, आज के सन्दर्भ मेंयह पूरी तो तब होगी जब आप शीर्षस्थ पद पर आसीन होने का ध्यानस्थ प्रयास करेंगे :

हमारे लिए, देश के लिए, संसारालोक के लिए । 

आशाएं लिए,

भारत का एक आम नागरिक

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